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वास्तु टिप्स

भूमि पर गृह निर्माण के कुछ आवश्यक जानकारियाँ

📅 26 अप्र, 2026 2 मिनट पढ़ने का समय 👁️ 8 बार पढ़ा गया
भूमि पर गृह निर्माण के कुछ आवश्यक जानकारियाँ

"शिल्पं बिना न हि जगत् त्रिषु लोकेषु विद्यते, जगद् विना न शिल्पं च वर्तते वसवप्रथे।"

(यह श्लोक शिल्प और जगत के परस्पर संबंध को दर्शाता है।)

वास्तु को भी पंचतत्वों से जोड़ा गया है और घर की अपनी आयु होती है। यदि गृह का निर्माण अच्छे मुहूर्त और वास्तु के अनुसार किया जाए, तो गृह दीर्घायु होता है तथा उसमें रहने वाले लोग धन-धान्य, वृद्धि, विद्या आदि से परिपूर्ण रहते हैं और रोग-शोक कभी नहीं आता।

भूमि को चारों वर्णों में अलग-अलग बताया गया है, जो प्रत्येक वर्ण के लिए वृद्धि कारक होती है।

वास्तु शास्त्र में गृह वास्तु, नगर वास्तु, द्वार वास्तु जैसे भवन निर्माण और मुख्य द्वार का निर्धारण किया जाता है, तथा यंत्र वास्तु के अंतर्गत यंत्रों के माध्यम से भी वास्तु का निर्धारण किया जाता है। इसी प्रकार भवन के कमरों का निर्धारण, जैसे शौचालय, मुख्य द्वार, पानी की टंकी आदि भी किया जाता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का निर्माण करना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह मिट्टी के प्रकार, रंग, गंध, ढलान आदि पर निर्भर करता है।

भूमि के प्रकार में यदि उत्तर और ईशान कोण के बीच की भूमि नीची हो तथा नैऋत्य और दक्षिण के मध्य की भूमि ऊँची हो, तो उसे 'दीर्घायु वास्तु' कहा जाता है। यह भूमि उत्तम और वंशवृद्धि कारक होती है।

इसी प्रकार पुण्यक भूमि, अपथ भूमि, रोगकार भूमि, अर्गल भूमि, श्मशान भूमि, श्येनक भूमि, सौमुख भूमि, ब्रह्म भूमि, स्थावर भूमि और शांडुल भूमि के प्रकार होते हैं।

वर्गाकार भूमि अत्यंत शुभ मानी जाती है, आयताकार भूमि श्रेष्ठ मानी जाती है, तथा वृत्ताकार भूमि भी शुभ मानी जाती है। अनियमित और टेढ़ी-मेढ़ी, कटी-फटी भूखंड अशुभ माने जाते हैं।

हाई-राइज बिल्डिंग, मॉल और फ्लैट के वास्तु विचार अलग होते हैं, तथा भूमि (प्लॉट) पर निर्माण की अलग वास्तु विधि होती है।

मकान या घर बनाने से पहले मिट्टी की गुणवत्ता, मिट्टी के प्रकार, मिट्टी का इतिहास, सड़क का स्थान, भूमि की ऊर्जा का परीक्षण तथा जल स्रोत आदि का निर्धारण किया जाता है। जैसे उत्तर या पूर्व दिशा गृह अथवा व्यापार के लिए उत्तम मानी जाती है।

भूमि के चयन में पीली, लाल और गंधहीन भूमि अच्छी मानी जाती है, जबकि चिपचिपी और बदबूदार भूमि अच्छी नहीं मानी जाती।

किसी भूमि में उत्तर प्लव, पूर्व प्लव, पश्चिम प्लव, दक्षिण प्लव, कषाय, अम्ल, कटु, रस, घृतगंध, रक्तगंध, अन्नगंध, मधुगंध, गंध, दर्भयुक्त, सरपत, दुर्वायुक्त, काशयुक्त, श्वेत वर्ण, रक्त वर्ण, पीत वर्ण, कृष्ण वर्ण आदि का ध्यान दिया जाता है। ये सभी मिट्टी के प्रकार हैं और इनसे मिट्टी का परीक्षण किया जाता है। यह चारों वर्णों के अनुसार बताया गया है।

ईशान कोण, आग्नेय कोण, नैऋत्य कोण, वायव्य कोण आदि का विचार गृह निर्माण में घर के वास्तु के अनुसार किया जाता है।